महामूर्ख की कहानी 

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आज हम आपको मुर्ख की उपाधि की एक कहानी सुनाने जा रहे है. ये बात देवराज राय के नगर की है क्योकि यहाँ पर होली का त्यौहार बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है. नगर के राजा देवराज राय होली का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाते थे. इस अवसर पर हास्य मनोरंजन के कई कार्यक्रम होते थे.

हर कार्यक्रम के सफल कलाकार को पुरस्कार भी दिया जाता था. सबसे बड़ा पुरस्कार मूर्ख की उपाधि पाने वाले को दिया जाता था. देवराज राय के दरबार में मोटूदेव सबका मनोरंजन करते थे. वे बहुत तेज दिमाग के थे. उन्हें हर साल का हास्य कलाकर का पुरस्कार तो मिलता ही था. मूर्ख का खिताब भी हर साल वही जीत ले जाते.

दरबारी इस कारण से उनसे जलते थे. उन्होंने एक बार मिलकर मोटूदेव को हराने की युक्ति निकाली. इस बार होली के दिन उन्होंने मोटूदेव को नींद की दवाई दे दी थी जिससे वो सोते रहे दी. होली के दिन मोटूदेव देर तक सोते रहे. उनकी नींद खुली तो उन्होंने देखा दोपहर हो रही थी.
वे भागते हुए दरबार पहुंचे. आधे कार्यक्रम खत्म हो चुके थे. देवराज राय उन्हें देखते ही डपटकर पूछ बैठे, अरे मूर्ख मोटूदेव, आज के दिन भी सो गए. राजा ने मोटूदेव को मूर्ख कहा, यह सुनकर सारे दरबारी खुश हो गए. उन्होंने भी राजा की हां में हां मिलाई और कहा, आपने बिलकुल ठीक कहा, मोटूदेव मूर्ख ही नहीं महामूर्ख हैं.
जब मोटूदेव ने सबके मुंह से यह बात सुनी तो वे मुस्कराते हुए राजा से बोले, धन्यवाद राज, आपने अपने मुंह से मुझे मूर्ख घोषित कर आज के दिन का सबसे बड़ा पुरस्कार दे दिया. मोटूदेव की यह बात सुनकर दरबारियों को अपनी भूल का पता चल गया, पर अब वे कर भी क्या सकते थे. क्योंकि वे खुद ही अपने मुंह से मोटूदेव को मूर्ख ठहरा चुके थे. हर साल की तरह इस साल भी मोटूदेव मूर्ख का पुरस्कार जीत ले गए. तो दोस्तों आपको कैसे लगी ये मजेदार कहानी. हमे जरूर बताये.

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